Friday, May 19, 2017

जॉन एलिया की मई : नाम

मैं तो अब शहर में कहीं भी नहीं
क्या मेरा नाम भी लिखा है कहीं 



Friday, May 12, 2017

जॉन एलिया की मई : धतूरा

ग़म न होता जो खिल के मुरझाते,
ग़म तो ये है कि हम खिले भी कहाँ


Sunday, May 7, 2017

जॉन एलिया की मई : खँडहर

लू चल रही है, महव है अपने में दोपहर
ख़ाक उड़ रही है और खँडहर खैरियत से है


Wednesday, May 3, 2017

जॉन एलिया की मई : जान

रूठा था तुझ से यानी खुद अपनी ख़ुशी से मैं 
फिर उसके बाद जान, न रूठा किसी से मैं 


Friday, April 28, 2017

एक बूँद


ज्यों निकल कर बादलों की गोद से।
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी।।
सोचने फिर फिर यही जी में लगी।
आह क्यों घर छोड़कर मैं यों बढ़ी।।


दैव मेरे भाग्य में क्या है बढ़ा।
में बचूँगी या मिलूँगी धूल में।।
या जलूँगी गिर अंगारे पर किसी।
चू पडूँगी या कमल के फूल में।।


बह गयी उस काल एक ऐसी हवा।
वह समुन्दर ओर आई अनमनी।।
एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला।
वह उसी में जा पड़ी मोती बनी।।



लोग यों ही है झिझकते, सोचते।
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर।।
किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें।
बूँद लौं कुछ और ही देता है कर।।
- अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

Friday, April 21, 2017

मोरा पिया मोसे बोलत नाही


Indian Roller, also known as नीलकंठ.
Clicked at Asian Institute of Technology 
Bangkok Thailand / September 2016