Wednesday, March 19, 2025

बंगाल की मैं शाम-ओ-सहर देख रहा हूँ

 देखा नहीं जाता है मगर देख रहा हूँ



रहमत का चमकने को है फिर नैयिर-ए-ताबां
होने को है इस शब की सहर देख रहा हूँ



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